Friday, November 18, 2011

हो जाए

जुबां का भी लिहाज़ हो जाए
कुछ इशारों में बात हो जाए
लफ्ज शायद बयां न कर पायें
इश्क जब बेहिसाब हो जाए

एक झलक से बड़ा सहारा है
वक़्त हसरत में बहुत गुजारा है
ये सफ़र रुकता नहीं है यादों का
दिन रहे या क़ि रात हो जाए

काश ऐसा हिसाब हो जाए
तेरी मेरी जो बात हो जाए
जीने मरने में मिले सुकूँ दिल को
"दीप" पूरी मुराद हो जाए

जुबां का भी लिहाज़ हो जाए ...


4 comments:

  1. बेहतरीन रचना...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  2. bahut khoob............sundar ati sundar:-)

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  3. काश ऐसा हिसाब हो जाए
    तेरी मेरी जो बात हो जाए
    जीने मरने में मिले सुकूँ दिल को
    "दीप" पूरी मुराद हो जाए
    gazal ka makta bahut khubsurat bana hain , mubarabad kubul karen

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  4. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 28-12-2011 को चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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